حينما يشدك القدر



تبحر في الحياة.. وقد شغلتك بأهداف ومسؤوليات وهموم..
ويمر يومك بين واجبات العمل وبين حاجيات البيت..
ويبقى القليل من الوقت لك.. لكي.. تسعد بهواياتك..


ويكون لك برنامجا معينا.. تخطو فيه خطواتك..
والعالم من حولك يبدو - أحيانا - ثابتا واضحا.. 
وربما، يخيل إليك.. انك في غرفة التحكم.. تخطط وتنفذ..


وتقول في نفسك.. اريد هذا، ولا اريد هذا..
واضعا نصب عينيك اهدافك والتزاماتك ورغباتك..
وتظن، وانت الخبير بنفسك وبالحياة، انك تعرف ما ينفعك..
وتقول، لما لا؟ اهناك من هو أعلم بي من نفسي؟
ويسرك، احيانا، أن تواجه العالم وتتحداه.. إن وقف أمامك..


ثم يأتي يوم.. وتتبعثر فيه اوراقك!


وتجد نفسك في مواجهة امر ما.. 
امر، لم تضعه في حسبانك.. وتجد في نفسك منه موانعا..
وتدير ظهرك.. وتغمض عينيك.. 
وتمر الأيام.. ويعود ذاك الأمر في مواجهتك..
وتقول.. لا! ليس هذا ما اريد.. لا يتوافق هذا مع رؤيتي واهدافي..
وتسير على خط الزمن.. فيواجهك ذاك الأمر.. مرة بعد مرة!
وكأن الدنيا تركت كل شيء.. وتفرغت لرميه أمامك..


وهنا تقف.. مشدودا.. مرغما..
فعقلك لم يقتنع بذاك الأمر..
ولكن القدر الالهي، كما يتضح، يشدك نحوه.. باصرار مغلف باللطف!
وتكتشف في نفسك.. احساسا مشجعا له..
احساسا.. يقوى.. كلما وجدت نفسك في المواجهة..


فما انت فاعل؟
اتصر على منطق عقلك وتحليله؟
ام تتبع اشارات القدر وقوة الاحساس؟